स्व. बाबू शंभू दयाल जी सक्सेना

जन्म: 10 जनवरी 1901 ग्राम अलीगढ़ जिला फर्रुखाबाद (उप्र)।

पिता: स्व. गुरु प्रसाद जी सक्सेना।

आरंभिक शिक्षा फर्रुखाबाद में बाद में प्रयाग-इलाहाबाद से उच्च शिक्षा।

आरंभ से लेखन/साहित्य पठन पाठन की तरफ रुचि। प्रथम प्रकाशित रचना मीठी-चुटकी स्व. श्री भगवती चरण वर्मा के साथ लिखी। बाद में सरस्वती, मॉर्डन रिव्यू में रचनाएं छपी। प्रयाग में चांद पत्रिका का सम्पादन।

1943 में स्व. श्री भैरुदान सेठिया ने सेठिया नाईट कॉलेज का प्रिंसिपल बना कर बीकानेर बुलाया।

बीकानेर आकर शिक्षा के साथ साहित्य सृजन, प्रकाशन, मुद्रण आदि का व्यवसाय किया और बढ़ाया।

कोटगेट पर प्रमुख पुस्तक, स्टेशनरी विक्रय तथा प्रकाशन संस्थान नवयुवा ग्रंथ कुटीर स्थापित की।

1950 में साप्ताहिक सेनानी समाचार पत्र का प्रकाशन शुरु किया जो अपनी निर्भीक निष्पक्ष लेखनी के लिए पूरे राजस्थान में प्रशंसित था अनेक बार उनके सम्पाकीय विधानसभा में चर्चा का विषय बने।सक्सेना अ. राजस्थान सम्पादक सम्मेलन के प्रथम अध्यक्ष बने।

साहित्य के क्षेत्र में उपन्यास, कहानी, काव्य, बाल साहित्य, एकांकी, नाटक सभी विधाओं में एक से एक सराहनीय पुस्तकें प्रकाशित हुई।

विभिन्न राज्य सरकारों संस्थानों से सम्मान व पुरस्कार मिले।

राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर ने उनके नाम शंभूदयाल सक्सेना बाल साहित्य पुरस्कार की स्थापना की जो प्रतिवर्ष श्रेष्ठ कृति पर दिया जाता है। बाबूजी के साहित्य पर डॉ. पुरुषोत्तम आसोपा, डॉ. देवदत्त शर्मा व कई अन्य ने शोध करके पी.एच.डी. प्राप्त की।

 


बीकानेर में उनका निवास देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों के आगमन का प्रमुख केन्द्र था।

 

उनकी प्रमुख पुस्तकें

उपन्यास:– मगरमच्छ।

कहानी संग्रह:- बहूरानी, धूप छांह, चित्रपट।

काव्य संग्रह:- निवेदन के आंसू, प्रतिवेदन के स्वर, चरणोदक, दंशिता, रत्न रेणु, बाल कवितावली, बाल प्रार्थना, लोरी प्रभाती, चन्द्र लोरी, मधु लोरी, रेशम झूला, ओरी निंदिया आरी जा, फूलों के गीत।

एकांकी व नाटक:– अंगारों की मौत, नेहरु के बाद तथा अन्य एकांकी, पर्णकुट्टी, बापू ने कहा था, विजया और वारुणी, आर्य मार्ग व अन्य एकांकी, पंचवटी, वल्कल, गंगाजली, पर्णकुट्टी, सगाई, चीवर धारिणी, साधना पथ, नंदरानी।

बाल साहित्य:- फूलों की सुनहरी कहानियां, रणबांकुरा, राजकुमार, हवाई किला, भालू की हार, देवताओं की कहानियां, मधुमक्खी पालन, राखी, फूलों की जन्म कथा, दुपहरिया के फूल, दो भाग, ऋषियों की कहानियां, सद्गुणों की कहानियां, सत्युग की कहानियां, बाप बेटे की कहानी, ज्ञान की कहानियां, सदुपदेश की कहानियां, सदाचार की कहानियां, दो नगरों की कहानी, जल परियों के साथ, राम काका की कुटिया, वीर संतान, राजकुमारों की कहानियां (2 भाग), राजकुमारियों की कहानियां (2 भाग), समाज सुधार, नया गांव, नया बैल, नया हल, नया खेत।

बाबूजी ने शिक्षा प्रसार को बढ़ावा देने में अग्रणी भूमिका निभाई। वे भारतीय विद्या मंदिर, राजस्थान बाल भारती, नागरी भंडार आदि की स्थापना में संलग्र रहे। बाबूजी का दीर्घ अस्वस्थता के बाद 18 मई 1976 को निधन हो गया। उनकी कीर्ति अभी भी उज्जवल है।