जैसा था पहले वैसा नहीं रहा आज मेरा शहर बीकाणा बदलता शहर

श्याम नारायण रंगा
जैसा था पहले वैसा नहीं रहा आज मेरा शहर बीकाणा बदलता शहर
एक समय था जब पश्चिमी राजस्थान के सूदूर रेगिस्तान में बसा बीकानेर शहर अपनी सरलता, सहजता, सौम्यता और संस्कृति के कारण पूरे देश में विशिष्ट स्थान रखता था। बीकानेर का नाम आते ही सभी के दिल में पाटों पर बसा, रेगिस्तान में फैला, सर्दियों में भयंकर ठंड के साथ कोहरे की चादर लपेटे और गर्मियों में जबरदस्त लू के थपेडों के साथ धूल भरी आंधियों की छवि सामने आती थी। साथ ही तस्वीर बनती थी ऐसे शहर की जो होली के रंगों से सरोबार है और गणगौर के गीत गा रहा है। ऐसा शहर जहां जैन समाज के महान संतों ने अपनी वाणी सुनाई और जहां मुस्लिम समाज ने साथ बैठकर दिपावली मनाई। बीकानेर से बाहर रहने वाले प्रवासी अपने शहर बीकानेर में घी, दूध, दही छाछ पीने आते थे । जब प्रवासी बीकानेरी अपनी कर्मभूमि पर बीमार हो जाता तो वहां उसको सलाह दी जाती थी कि आप अपने शहर बीकानेर चले जाईए और स्वस्थ हवा पानी लिजिए। अपणायत की संस्कृति के साथ सबको अपने में समेटे ये शहर सबका स्वागत करता था और जहां चैन था, सूूकून था, शांति थी। अपराध नाममात्र का था। एक ऐसा शहर जहां लोग सुरक्षित थे और ऐसा कहा जाता था कि अगर देर रात्रि में भी कोई औरत गहनों से लदी हुई अकेली अपने घर जा रही है तो वो अपनी सुरक्षा को लेकर निश्चिंत है। जहां अनजान व्यक्ति को देखकर पाटों पर बैठे लोग आवाज देकर पूछते थे कि भाई कौन हो, किसका पूछ रहे हो। यह सामाजिक मोनिटरिंग बीकानेर की धरोहर थी और किसी की हिम्मत नहीं थी कि वो कोई गैर कानूनी हरकत कर सके। परंतु समय की करवट जब बदली तो उसका असर बीकानेर पर भी पडा। आज बीकानेर वैसा नहीं रहा जैसा हुआ करता था। आज बीकानेर वो ही है, पाटे वो ही है, त्यौंहार वैसे ही आते है लेकिन जो रंगत जो रौनक और जो अपनायत थी उसका अभाव साफ देखने को मिलता है। स्वय की कोटर में कैद होता शहरवासी रोकने टोकने की आदत छोड चुका है। सामाजिक मोनिटरिंग के अभाव ने अपराधों को बढावा दिया है। आज आमजन के मन में यह बात घर कर गई है कि हम क्यों किसी को कुछ कहें, टूटते परिवारों में साझा चूल्हे की विरासत को नष्ट कर दिया है और संबंध दरकते नजर आते हैं। आज घर का बुजुर्ग भी अपने ही घर के युवा को टोकने से डरता है। बुजुर्ग का ये सोचना है कि अगर सामने बोल गया तो मेरी बची खुची इज्जत भी जाती रहेगी। नशे जैसी जानलेवा बीमारी ने अपने पांव पसार लिए हैं। क्रिकेट के सट्टे ने गली गली में नए व्यवसायी पैदा कर दिए हैं। साम्प्रदायिक सौहार्द भी दरकता नजर आता है। पिछले दशक में कईं बार साम्प्रदायिक सौहार्द पर चोट होती नजर आई। मगर साम्प्रदायिक सौहार्द को कहीं न कहीं आज भी बचाकर रखा गया है। उत्तेजना के पल कईं बार आते हैं परंतु लगभग छ: दशक की विरासत भारी पडती है। जुए की लत ने युवाओं को दिशाहीन किया है। अनचाहे ब्याज का धंधा कईं जीवन लील चुका है। कहा जाता था कि बीकानेर में पीने का पानी कुओं से निकाला जाता था इसलिए गहरा पानी पीने वाले लोगों की सोच भी गहरी होती थी और उनका जीवन संजीदा होता था परंतु नहरी सतही पानी पीने वाले लोग अब गहरी सोच के नहीं रहे। नहर के गंदे पानी ने विचार को भी दूषित किया है। नित होती चैन स्नेचिंग, लूटपाट, चोरी आदि की घटनाओं ने आमजन में असुरक्षा की भावना बनाई है। खाने पीने में मिलावट खुलेआम जारी है। आए दिन सरकारी अमला मिलावट और जमाखोरी को पकडता है। मिलावट करने वाले लोग भीतर छुपे ऐसे आतंकवादी हैं जो इस शहर की मूल संस्कृति को खराब कर रहे हैं। आज कोलकत्ता, मुम्बई सहित प्रवासी बीकानेरी यह बात खुलेआम कहता नजर आता है कि आज बीकानेर के दूध दही घी छाछ में पहले जैसी बात बिलकुल भी नहीं रही है। त्यौंहारों की चमक और रौनक भी पहले जैसी बिलकुल नहीं रही है। किसी समय अक्षय तृतीया और अक्षय द्वितीया पर महीने महीने भरी पतंग उडाने वाला शहर आज त्यौंहार के दिन भी उस उत्साह में नजर नहीं आता है। होली की रौनक में पिछले दो दशकों से खासा फीकापन आया है। दिपावली तो ऐसे लगता है जैसे दिखावे का ही त्यौंहार रह गया है। शादी विवाह में भी परम्पराओं का स्थान आधुनिकता ने ले लिया है। बढ चढ कर खर्चा करना इस मितव्वययी शहर में रच बस सा गया है। धार्मिकस्तर पर भी एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृति बढी ही है। कुल मिलाकर जैसा था वैसा नहीं रहा मेरा शहर। आज स्थापना दिवस पर एक बार इस विषय पर जरूर सोचें और मनन चिंतन करें कि हम लगभग साढे पांच सौ साल की विशाल व समृद्ध परम्परा को कैसे अक्षुण बनाए रखें और शहर के प्रति सच्चा प्रेम ये ही होगा कि कि हम सब जी जान से प्रचास करें कि बीकानेर को बीकानेर रहने दें। जय जय बीकाणा।

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