लेखक त्रिलोक दीप
पिछले दिनों लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशी राम को ‘सामाजिक न्याय का योद्धा’ और ‘सशक्तिकरण का प्रतीक’ बताते हुए उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ दिए जाने की मांग की. इस आशय का एक पत्र उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिख कर उन्हें सम्मानित करने के लिए कहा. यह मांग राहुल गांधी ने लखनऊ में 15 मार्च, 2026 को कांशी राम के जन्मदिन पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए की . राहुल गांधी ने उनकी विचारधारा की प्रशंसा की और कांग्रेस की पिछली गलतियों को स्वीकार करते हुए उनके संघर्ष को याद किया.इतना ही नहीं राहुल गांधी ने कांशी राम को एक ऐसे नेता के तौर पर स्मरण किया जिन्होंने दलितों और हाशिये पर पड़े समुदायों के लिए अपने जीवन में कभी समझौता नहीं किया. यहां तक तो ठीक है लेकिन राहुल गांधी ने यह कहकर कि अगर नेहरू जी जीवित होते तो कांशी राम कांग्रेस के मुख्यमंत्री बनते उनके कद को छोटा करने का प्रयास किया है.
उधर दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने राहुल गांधी के इस कदम को दलित वोट बैंक
में सेंध लगाने की कोशिश बताते हुए उनकी कड़ी आलोचना की और कहा कि कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए कांशी राम का सम्मान नहीं किया. इस कदम को 2027 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले दलित मतदाताओं को कांग्रेस की ओर आकर्षित करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है. कांग्रेस इस कदम के जरिये दलित वोट बैंक को फिर से अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है. मायावती ने पूछा कि जब कांशी राम का निधन हुआ था तब कांग्रेस ने एक दिन का शोक तक नहीं मनाया था और वह अब किस मुंह से उन्हें ‘भारत रत्न’ देने की मांग कर रही है.मायावती ने राहुल गांधी के इस कदम को दलितों के प्रति कांग्रेस का दिखावा बताया और कांशी राम की विरासत को हथियाने का प्रयास करार दिया.
राहुल गांधी ने यह भी कहा था कि यदि कांग्रेस ने पहले बेहतर काम किया होता तो कांशी राम को अलग से संघर्ष करने की आवश्यकता नहीं पड़ती. उन्होंने स्वीकार किया कि कांग्रेस की पूर्व की कुछ कमियां रही थीं जिसके कारण कांशी राम को अलग से संघर्ष करना पड़ा. राहुल गांधी आज स्वीकार करते हैं कि वह कांशी राम के विचारों और सिद्धांतों को सही मायने में समझते हैं और इसीलिए वह लोकसभा के भीतर और बाहर भी दलितों, शोषितों, आदिवासियों, अन्य पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्गो के अधिकारों जैसे मुद्दे खूब उठाते रहते हैं. संभव है वह यह साबित करना चाहते हों कि कांशी राम के विचारों और सिद्धांतों को सही मायने में वही समझते हैं और इन वर्गो की बदहाली का मुद्दा उठाते रहते हैं. राहुल गांधी का यह मानना है कि वह बसपा को हड़पने का कोई इरादा नहीं रखते बल्कि कांशी राम की सोच और विचारधारा का विस्तार कर रहे हैं. 2024 के लोकसभा के नतीजे इसका स्पष्ट संकेत देते हैं. दलितों, शोषितों और पिछड़ा वर्ग ने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी गठबंधन को तरजीह दी थी जिसके चलते यह गठबंधन भारतीय जनता पार्टी से आगे निकल गया और बहुजन समाज पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली. कभी बसपा के लोकसभा में 14 सांसद थे. यह बात 1999 की है. तब बसपा के सुप्रीमो
कांशी राम थे.
कांशी राम से मेरी बीसियों मुलकातें हैं.उनके जूनून को मैंने नज़दीक से देखा है. मैंने उन्हें दिल्ली के रेहगड़पुरा (करोलबाग के पास) एक छोटे से कमरे में भी देखा है और हुमायूं रोड वाले सांसदों के बंगले में भी. मुझे तो उनके रहन सहन में कोई फर्क नहीं दीखा. वह जैसे सीधेसाधे, साफगो इंसान पहले थे यहां भी वैसे ही दीखे. कांशी राम को मैंने 1971 में अखिल भारतीय अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों के शिक्षित सदस्यों से बने संगठन ‘बामसेफ’,1981 में दलित, शोषित समाज संघर्ष समिति
( डीएस4) के निर्माण को देखा जिसमें उन्होंने कहा था कि हमारी संस्थाएं न तो धार्मिक हैं और न ही राजनीतिक और न ही हमारा उद्देश्य आंदोलन करना है बल्कि हमारा यह सामाजिक संगठन है. उस समय उनका नारा था
‘ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया छोड़, बाकी सब डीएस4’. इसके माध्यम से दलितों, शोषितों तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के बीच
चेतना जगाई और उनकी सहायता से जगह जगह छितरे मतों का एकीकरण करने का काम किया. अभी तक ये सभी मत थोक भाव से कांग्रेस तथा अन्य पार्टियों के बीच विभाजित हो जाया करते थे. लिहाज़ा 1984 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना की और नारा दिया ‘ जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी’. 1984 में निर्मित बसपा के संस्थापक कांशी राम छत्तीसगढ़ के जांजगीर से लोकसभा के चुनावी मैदान में कूदे और हार गए. 1988 और 1989 का चुनाव हारने के बाद कांशी राम ने कहा था कि ‘ बसपा पहला चुनाव हारने के लिए, दूसरा नज़र में आने के लिए और तीसरा जीत दर्ज करने के लिए लड़ती है ‘. कांशी राम 1991 में इटावा और 1996 में होशियारपुर से लोकसभा के चुनाव जीते और 1998-2004 तक राज्यसभा के सदस्य रहे. इन चुनाव परिणामों से राजनीति में बसपा को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो गया. अब पार्टी के लोग कांशी राम को ‘ मान्यवर’, ‘ साहब कांशी राम ‘, ‘ बहुजन नायक कांशी राम’ आदि से संबोधित करने लगे थे.इसी प्रकार मायावती ने 1989 में बिजनौर से भारी मतों से लोकसभा का चुनाव जीत कर बसपा की धाक जमा दी. लेकिन कांशी राम ने मायावती का कार्य क्षेत्र उत्तरप्रदेश तक ही सीमित रखा. लिहाज़ा 1995 में उन्होंने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री का पद संभाला और वह चार बार राज्य की मुख्यमंत्री रहीं 1995, 1997, 2002-2003 तथा 2007-2012 तक. पहली तीन बार वह भाजपा के बाहरी समर्थन से मुख्यमंत्री रहीं जबकि 2007-2012 तक शुद्ध बसपा की बदौलत.
तीन बार सांसद होने के बावजूद कांशी राम का मन संसद में नहीं रमता था और सांसद के तौर पर उनका योगदान अधिक नहीं रहा. उन्होंने मुझे बड़ी बेबाकी से बताया था कि ‘ यहां बैठकर वक़्त ज़ाया करने से बेहतर है पार्टी संगठन को मज़बूत करना.’ कांशी राम अक्सर कहते थे कि हम लोग देश की आबादी का 70 फीसदी से ज़्यादा हैं. हमारा शोषण ये तथाकथित बड़ी पार्टियां कई दशकों से करती




