
वीरेंद्र बहादुर सिंह
गर्मियों में सबसे ज्यादा याद क्या आता है? आम की बराबरी करने वाला जवाब है एसी यानी एयर कंडीशनर। पर क्या आपको पता है कि 1902 में उसकी खोज कई वैज्ञानिक खोजों की तरह दुर्घटनावश हुई थी। जैसे डायबिटीज़ की दवा खोजने जाते-जाते वजन घटाने की दवा हाथ में आ गई, वैसे ही। मूल तो अमेरिका के ब्रुकलिन स्थित एक प्रिंटिंग यूनिट में नमी के कारण छपाई ठीक से नहीं हो रही थी। उस नमी को कम करने की तापमान नियंत्रण की कोशिश में इंजीनियर विलिस कैरियर ने कूलिंग वॉटर से हवा गुजरने पर ठंडी हो जाए ऐसी कॉइल बना निकाली और धीरे-धीरे उसी से नए माने जाने वाले एयर कंडीशनर विकसित होते गए।
ऐसी ही रोमांचक कहानी चंद्रयात्रा की है। मानवजाति को वैसे भी चांद सचमुच पागल बना दे ऐसा आकर्षण है। पर कल्पना को विज्ञान में जगह मिली हमारी जिज्ञासा के कारण। मून मिशन स्पेस रेस का महत्वपूर्ण अध्याय था जर्मन वैज्ञानिकों के विश्वयुद्ध के बाद बंट चुके अमेरिका और रूस के लिए। वैसे पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवों में मनुष्य सबसे अधिक जिज्ञासु प्राणी है। जब से हममें समझ आई, तब से मनुष्य ने चंद्रमा पर जाने के सपने देखे थे। मनुष्य की यही सहज जिज्ञासा उर्फ क्यूरियोसिटी का परिणाम वह ज्ञान का खजाना है, जिसके फायदे आज हम उठा रहे हैं।
हमारे पास खेती हो या इंटरनेट, अस्पताल हो या आइसक्रीम, कार हो या टीवी, यह सब ऐसे जिज्ञासु मनुष्यों की ही देन हैं, जो ऐसे सवालों के जवाब खोजने निकले थे, जो शायद उस समय बिलकुल सामान्य होते हुए भी बहुत कठिन लगते थे। उन लोगों को शायद अंदाज भी नहीं होगा कि उनके इस नए ज्ञान का भविष्य की दुनिया पर कितना गहरा असर पड़ेगा। आज हमारा जीवन इतना आरामदायक है, क्योंकि अतीत में उनके विस्मय ने सुविधाओं का मार्ग बनाया।
इसलिए अभी भी बहुतों को परवाह ही नहीं होती कि अमेरिका ईरान से टकराव करते हुए चंद्रमा की परिक्रमा कर आर्टेमिस टू में घूमकर आया, वह घटना क्या थी। आप जानते हैं? भले जेफ बेजोस और रिचर्ड ब्रैनसन जैसे अरबपति आकाश में सैर करते हों और इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में अंतरिक्षयात्री आते-जाते हों, वह डीप स्पेस यानी अंतरिक्ष नहीं है। उसकी यात्रा तो अब तक केवल 28 पृथ्वीवासी मनुष्यों ने ही की है। इतिहास में अब तक केवल 24 ही मनुष्य ऐसे हैं, जिन्होंने ‘डीप स्पेस’ (गहरे अंतरिक्ष) की यात्रा की है। ये वे 24 ‘एपोलो’ अंतरिक्षयात्री थे, जिन्होंने 1968 से 1972 के बीच अब तक के सबसे विशाल राकेटों में बैठकर चंद्रमा तक लंबी यात्रा की थी और वह भी केवल इसलिए, क्योंकि हम वह कर सकने में सक्षम थे और अमेरिका के पास उसके लिए पैसे खर्च करने की राजनीतिक इच्छा थी। (खासकर कैनेडी जैसे राष्ट्रपति की) उन 24 में से 12 ने चंद्रमा पर कदम रखा था। बाकी हम सब तो ‘चंदामामा दूर के’ गाना गाकर चंद्रमा के फोटो ही खींचते रह जाते हैं!
0 ग्रीक पौराणिक कथाओं में एपोलो की बहन मानी जाने वाली ‘आर्टेमिस’ के नाम पर बने वर्तमान अमेरिकी मून मिशन प्रोजेक्ट को तैयार होने में दशकों लगे। जिसके बीज 2004 में बोए गए थे, जिसे तब ‘कॉन्स्टेलेशन प्रोग्राम’ कहा जाता था। चंद्रमा पर वापस लौटने के प्रयास रूप में ओरायन और स्पेस लांच सिस्टम का विकास तभी शुरू हो गया था। पहला मिशन, आर्टेमिस 1, 16 नवंबर, 2022 को लांच किया गया था। टेस्टिंग के लिए यह मानवरहित फ्लाइट सफल हुई, जिसमें खास महत्व की ओरायन नाम की शंकु आकार की एक कैप्सूल है। पृथ्वी के वातावरण में वापस लौटते समय वह अपना चौड़ा और सपाट भाग पृथ्वी की ओर रखती है। ठीक वहीं उसकी हीट शील्ड लगी होती है, जो ‘एवकोट’ नामक खास मटेरियल से बनी है। उसकी खामी सुधारने में ही दूसरा मिशन देर से हुआ। इस मिशन में ‘स्किप एंट्री’ का उपयोग हुआ था। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें स्पेसक्राफ्ट वातावरण में प्रवेश करता है, फिर थोड़ा बाहर निकलता है और फिर वापस प्रवेश करता है। जैसे तालाब के पानी पर कंकड़ उछालें और वह टप्पे खाकर आगे बढ़े! उसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि चंद्रमा से पृथ्वी पर लौटते समय स्पेसक्राफ्ट की जो प्रचंड गति होती है, उसे धीमा किया जा सकता है। समुद्र में निश्चित जगह पर पिनपॉइंट लैंडिंग यानी स्प्लैशडाउन करवाना आसान रहता है।
उस ओरायन कैप्सूल में रहने के लिए केवल 330 क्यूबिक फुट जितनी ही जगह है। और इतनी छोटी जगह में चार अंतरिक्षयात्रियों को लगभग दस दिन तक रहना, काम करना और सोना। उसमें सफलतापूर्वक चंद्रमा की परिक्रमा करके कमांडर वाइजमैन, पायलट विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टिना कोच और जेरेमी हैनसन आए। उनके पास ऐसा स्पेससूट था कि शायद कैप्सूल से हवा (वातावरण) गायब हो जाए, तो भी यह सूट उन्हें 144 घंटे तक जीवित रख सके!
यह सारी खोजें पृथ्वी पर न हुई होतीं, पर इसलिए हुईं कि मनुष्य को चंद्रमा पर जाना था। पर वह तो जो मोबाइल कैमरे से हम घर की खिड़की से चंद्रमा के फोटो खींचते हैं, वह भी हमारे पास न होता, अगर चंद्रयात्रा न हुई होती तो। आप जानते हैं कितनी खोजें हमारे रोजमर्रा के जीवन में अमेरिका की नासा के कारण अंतरिक्ष के बदले पृथ्वी पर हमारे घर में आ गईं?
1962 में लांच हुए ‘टेलस्टार’ सैटेलाइट के साथ ही सैटेलाइट कम्युनिकेशन की शुरुआत हुई। नासा ने इस टेक्नोलाजी में लगातार जो सुधार किए हैं, उसके कारण ही आज हाई-डेफिनिशन एचडी वीडियो और ऑडियो ट्रांसमिशन का रिवोल्यूशन आ गया।
90 के दशक में, नासा की ‘जेट प्रपल्शन लेबोरेटरी’ ने स्पेसक्राफ्ट में लगाए जा सकने वाले आकार में छोटे, पर वैज्ञानिक गुणवत्ता वाले कैमरे बनाने पर काम किया था। आज दुनिया के तीसरे भाग के कैमरों में इसी टेक्नोलाजी का उपयोग होता है। मगर यह तो कुछ भी नहीं।
आज के डिजिटल जीवन की चाबी यानी कंप्यूटर माइक्रोचिप। उसकी खोज इंटेल के रॉबर्ट नायस ने की थी और टेक्सास इंस्ट्रूमेंट्स के जैक किल्बी ने उसे एपोलो स्पेसक्राफ्ट में फिट किया था। स्पेसक्राफ्ट की सिस्टम को छोटा करने और उसका वजन घटाने के लिए यह आविष्कार हुआ था! यह पहली बार था, जब अलग-अलग ट्रांजिस्टर और सर्किट के भागों का उपयोग करने के बजाय सिस्टम के सभी भागों को एक ही चिप पर बैठाया गया था। इससे ही 1980 के दशक में पर्सनल कंप्यूटर की क्रांति आई और फिर जो हुआ उसने हमारी दुनिया कैसी बदल दी, यह पता ही है!
स्क्रैच-रेजिस्टेंट लेंस बिना आज के चश्मे कोई पहनता नहीं और मोबाइल फोन के कैमरा लेंस भी कहीं रखो या घिसें तो धुंधले नहीं पड़ते, न दरार पड़ती है। 1970 के दशक में ये लेंस बाजार में आए। इन लेंसों पर लगने वाली खरोंच-रोधी कोटिंग का उपयोग जेमिनी और एपोलो स्पेसक्राफ्ट के प्लास्टिक भागों और अन्य साधनों को खराब वातावरण से बचाने के लिए होता था। अंतरिक्षयात्रियों के स्पेस हेलमेट के कांच (वाइजर) पर बिलकुल ऐसा ही हीरे जैसा मजबूत कार्बन कोटिंग किया जाता था।
वीरेंद्र बहादुर सिंह
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