काश! वो मूँज वाली चारपाई फिर लौट आए

अनोखा उपहार पति ने मुझे जन्मदिन पर उपहार दिलाने की इच्छा जताई। मैंने झट से कहा मुझे चाहिए मूँज वाली चारपाई |। ! वो भी क्या दिन थे छत पर और आँगन में होती थी चारपाई। बाल्टी से पानी डालते थे ताकि फर्श की हो तराई ||पानी डालने को लेकर भाई बहन में होती थी लड़ाई ! फिर माँ पिताजी करते थे हमारी पिटाई ||. चारपाई पर खुले आसमान में तारों को देखना ! तारों की गिनती करते हुए सो जाना | वो चाँद की रोशनी बहुत भाती थी भाई |
मूँज की चारपाई से हो गई प्लास्टिक की चारपाई। फिर कूलर आ जाने पर चारपाई ने कमरों में धाक जमाई ||। आ गए लकड़ी के पलंग और चारपाई की हो गई विदाई ||। ए सी ने कर ली खूब कमाई ||। अब तो हैं डबल बेड़ का ज़माना मेरे भाई ! सब सोते हैं अपने अपने कमरों में , क्योंकि इन सब ने आपस की दूरियाँ बड़ाईं || कितनी भी सुख सुविधा हो फिर भी मैं ना भूल पाई वो मूँज वाली चारपाई |। पति ने भी प्रीत निभाई। मेरे जन्मदिन पर ला दी बच्चों के खिलौनों वाली चारपाई । ।और साथ में मेरी पसंदीदा मिठाई ।। मैं तो इस अनोखे उपहार को देख कर फूली ना समाई । जब करवट बदली और ली अंगड़ाई ।। तो देखा ये तो एक सपना था मेरे भाई ॥ और मन में मेरे मायूसी सी छाई।मैं बोली “काश ये होती सच्चाई “।। शिक्षाविद। अलका डॉली पाठक

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