कोडमदेसर भैरवजी का वार्षिक मेला आज से, हजारों श्रद्धालु पहुंचेंगे
बीकानेर। बीकानेर से करीब 24 किलोमीटर दूर ऐतिहासिक एवं आस्था के प्रमुख केंद्र कोडमदेसर में भैरवजी का वार्षिक मेला 23 और 24 सितंबर को आयोजित होगा। मेले को लेकर तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। बीकानेर शहर और आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पैदल और विभिन्न वाहनों से कोडमदेसर पहुंचेंगे। बुधवार रात श्रद्धालु कोडमदेसर में रुककर भैरवजी की स्तुति-वंदना और भक्ति करेंगे।
श्री देदारामजी गहलोत (माली) वंशज सार्वजनिक प्रन्यास के पदाधिकारियों और पुजारी परिवार के सदस्यों की बैठक में मेले की तैयारियों को अंतिम रूप दिया गया। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पेयजल, भीड़ नियंत्रण और सुगमता से दर्शन-पूजन की व्यवस्था की गई है। मंदिर परिसर और मेला स्थल पर आकर्षक रोशनी एवं सजावट भी की गई है। प्रन्यास के अध्यक्ष विजय गहलोत ने बताया कि भादवा सुदी द्वादशी के अवसर पर बुधवार को भैरवजी का विशेष पूजन, श्रृंगार, भोग और महाआरती के साथ मेले का शुभारंभ होगा।
मेले को लेकर मेला स्थल पर खानपान, खिलौनों और प्रसाद की दुकानें भी सजने लगी हैं। श्रद्धालु बुधवार सुबह से ही पैदल और विभिन्न वाहनों से भैरवनाथ के जयकारे लगाते हुए मंदिर पहुंचना शुरू करेंगे। प्रन्यास की ओर से जिला एवं पुलिस प्रशासन को ज्ञापन देकर चोरी और अप्रिय घटनाओं की रोकथाम, मंदिर के आसपास अस्थायी अतिक्रमण हटाने तथा यातायात व्यवस्था सुचारू रखने की मांग की गई है।
पैदल यात्रियों के लिए लगेंगे सेवा शिविर
मेले के दौरान बीकानेर की चुंगी चौकी से कोडमदेसर गांव तक विभिन्न सामाजिक एवं स्वयंसेवी संगठनों की ओर से सेवा शिविर लगाए जाएंगे। इन शिविरों में श्रद्धालुओं के लिए चाय, नाश्ता, पेयजल, पकौड़ी, फल और आइसक्रीम सहित विभिन्न सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। मंगलवार को ही कई सेवा संगठनों ने शिविरों के लिए टेंट लगाने का काम शुरू कर दिया।
बीकानेर स्थापना से पहले का है मंदिर
कोडमदेसर भैरवजी मंदिर का इतिहास बीकानेर की स्थापना से भी पुराना माना जाता है। मान्यता के अनुसार करीब 1465 के आसपास राव बीकाजी के जोधपुर से बीकानेर की ओर आने के दौरान यह क्षेत्र उनके शुरुआती पड़ावों में शामिल था। राव जोधा की पुत्री और राव बीका की बहन राजकुमारी कोडमदे के नाम पर इस स्थान का नाम कोडमदेसर पड़ा। मंदिर के पीछे स्थित तालाब भी ऐतिहासिक महत्व रखता है और इसमें 1459 ईस्वी से जुड़े तथ्य अंकित बताए जाते हैं।
कोडमदेसर भैरवजी को बीकानेर सहित विभिन्न जाति-समुदायों के लोग रक्षक और आराध्य देव के रूप में मानते हैं। मान्यता है कि गोरे भैरवजी की प्रतिमा मंडोर से लाकर यहां स्थापित की गई थी। भैरवजी की प्रतिमा खुले आसमान के नीचे स्थापित है और मंदिर पर छत नहीं है। श्री देदारामजी गहलोत (माली) के पूर्वजों द्वारा प्रतिमा स्थापित किए जाने के कारण आज भी बीकानेर और सुजानदेसर के गहलोत परिवार के सदस्य अपनी बारी के अनुसार पुजारी और भोपा के रूप में सेवा-पूजा करते हैं। बीकानेर रियासत के पूर्व महाराजा गंगासिंहजी द्वारा इटली के संगमरमर से मंदिर का जीर्णोद्धार करवाए जाने का भी उल्लेख मिलता है। मेले के दौरान राजपरिवार की ओर से छत्र और भेंट चढ़ाने की परंपरा भी रही है।




