लोकगीत हमारी सांस्कृतिक विरासत के संवाहक : प्रो. अन्नाराम शर्मा

बीकानेर, 10 अक्टूबर 2026। स्थानीय बेसिक महाविद्यालय में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की नगर इकाई, बीकानेर के तत्वावधान में प्राक् लोक मंथन कार्यक्रम‘भात में बीरा गायन’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में राजस्थानी लोकगीतों की समृद्ध परंपरा को सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया। लोकगीतों के माध्यम से राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत, पारिवारिक आत्मीयता और लोकजीवन की जीवंत परंपराओं को अभिव्यक्ति मिली।कार्यक्रम में विषय प्रवर्तन करते हुए राजकीय डूंगर महाविद्यालय, बीकानेर के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के केंद्रीय लोक साहित्य प्रमुख प्रो. अन्नाराम शर्मा ने कहा कि लोक ही भारत की आत्मा है और लोकगीत हमारी सांस्कृतिक विरासत के संवाहक हैं। भारत की पहचान केवल उसके इतिहास और भूगोल से नहीं, बल्कि उसकी विविधतापूर्ण लोक संस्कृति से निर्मित होती है। नगर, महानगर, गांव, कस्बे, मेले, सोलह संस्कार, ऋतुएं, पशु-पक्षी, त्योहार, लोकगीत, लोकनृत्य, लोकभाषाएं और लोकाचार मिलकर भारतीय जीवनोत्सव को साकार करते हैं।प्रो. शर्मा ने कहा कि भारतीय लोक संस्कृति में शास्त्र और परंपरा, व्यवहार और आध्यात्मिकता तथा प्रकृति और मानव जीवन का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। लोक भारत की सामूहिक चेतना का प्रतीक है, जिसमें सरलता, सहिष्णुता, करुणा, परिश्रम, आस्था, पारिवारिक आत्मीयता और प्रकृति के प्रति समर्पण जैसे जीवनमूल्य समाहित हैं। लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होने वाली सांस्कृतिक स्मृतियों, सामाजिक संबंधों और जीवनानुभवों के सशक्त संवाहक हैं।उन्होंने बताया कि यह आयोजन ‘प्राक् लोकमंथन-2026’ के अंतर्गत किया गया है। लोकमंथन राष्ट्रीय स्तर का ऐसा वैचारिक विमर्श मंच है, जहां विचारक, शिक्षाविद्, वैज्ञानिक, साहित्यकार, न्यायवेत्ता, इतिहासकार, शोधार्थी, युवा और सामाजिक कार्यकर्ता समकालीन वैश्विक समस्याओं पर भारतीय दृष्टि से विचार-विमर्श करते हैं। वर्ष 2016 में भोपाल से शुरू हुई लोकमंथन की यात्रा रांची, गुवाहाटी और भाग्यनगर तक पहुंची है। इस क्रम में आगामी 4 से 6 दिसंबर 2026 तक जयपुर में लोकमंथन का आयोजन होगा। इस वर्ष का ध्येय वाक्य ‘हम भारत के लोग’ है। कार्यक्रम के लिए ऑनलाइन पंजीकरण की सुविधा भी उपलब्ध है।प्रो. शर्मा ने कहा कि लोकमंथन का उद्देश्य भारतीय राष्ट्रीय जीवन के विविध क्षेत्रों में ज्ञान परंपरा का पुनर्पाठ करना, रचनात्मक संवाद को प्रोत्साहित करना तथा युवाओं, शोधार्थियों और नई पीढ़ी को भारतीय चिंतन से जोड़ना है। इसके माध्यम से भारतीय कला, साहित्य, इतिहास, विज्ञान और संस्कृति के विविध आयामों का समन्वित प्रस्तुतीकरण करते हुए राष्ट्रीय विमर्श को नई दिशा देने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोक परंपराओं और कलाकारों को मंच प्रदान करना इसी व्यापक उद्देश्य की महत्त्वपूर्ण कड़ी है।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ठाकुर दास ने लोकगीतों के विविध रूपों और उनकी सांस्कृतिक महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने पारिवारिक परंपराओं को लोक संस्कृति से जोड़ते हुए ‘भात’ परंपरा तथा ‘मायरा’ की महत्ता बताई। उन्होंने कहा कि लोकगीतों में भाई-बहन के अटूट प्रेम, पारिवारिक आत्मीयता और सामाजिक संबंधों की भावनाएं सहज रूप में अभिव्यक्त होती हैं।कार्यक्रम का संयोजन डॉ. राजश्री भाटी ने किया। उनके साथ विनोद तंवर, सुधा आचार्य, डॉ. शशि बेसरवारिया सरिता गहलोत सहित अन्य लोक गायिकाओं ने ठेठ राजस्थानी भाषा में पारंपरिक गीतों की मनमोहक प्रस्तुतियां दीं। महाविद्यालय की डी.एल.एड. की छात्राओं ने भी लोकगीतों की प्रस्तुतियों में उत्साहपूर्वक सहभागिता की। गीतों के माध्यम से राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं और लोकजीवन की आत्मीयता का प्रभावशाली चित्र उभरकर सामने आया।कार्यक्रम की अध्यक्षता बेसिक महाविद्यालय के निदेशक श्री रामजी व्यास ने की। उन्होंने प्रो. अन्नाराम शर्मा को गीतों की एक पुस्तक भेंट की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि महाविद्यालय लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए निरंतर प्रयासरत है। ऐसे आयोजन विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ संस्थान की सांस्कृतिक चेतना को भी समृद्ध करते हैं।इस अवसर पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की ओर से उपस्थित लोक गायिकाओं का दुपट्टा ओढ़ाकर स्वागत एवं सम्मान किया गया। कार्यक्रम में महाविद्यालय के अकादमिक एवं व्यावसायिक अनुशासन से जुड़े छात्र-छात्राओं ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन राजकीय डूंगर महाविद्यालय की व्याख्याता डॉ. छाया शर्मा ने किया तथा अंत में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के संभाग सह-संयोजक डॉ. मूलचंद बोहरा ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में बसन्ती हर्ष डाॅ. श्रीनिवास शर्मा, मोनिका गौड़ मधुरिमा जी आदि भी उपस्थित रहे ‘भात में बीरा गायन’ कार्यक्रम ने राजस्थानी लोकगीतों की जीवंत परंपरा को मंच प्रदान करने के साथ ही नई पीढ़ी को अपनी लोक-सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का सार्थक प्रयास किया। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि लोक परंपराओं का संरक्षण केवल अतीत को सहेजना नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक चेतना को भविष्य तक पहुंचाना भी है।

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