श्रीडूंगरगढ़ 29 मई (शुभकरण पारीक) क्षेत्र में इन दिनों टिटहरी (टिटोली/टिटोनी) पक्षी अपने घोंसलों और अंडों को लेकर चर्चा का विषय बनी हुई है। खुले मैदानों और खेतों में जमीन पर रहने वाली यह अनोखी चिड़िया न केवल अपनी तेज आवाज के लिए जानी जाती है, बल्कि मौसम के संकेत देने वाली पक्षी के रूप में भी ग्रामीण समाज में विशेष पहचान रखती है।
टिटहरी का वैज्ञानिक नाम वेनेलस इंडिकस है। यह पक्षी सामान्यतः खेतों, चारागाहों, तालाबों और नदी-नालों के किनारों पर दिखाई देता है। विशेष बात यह है कि यह पक्षी पेड़ों पर घोंसला नहीं बनाता, बल्कि जमीन पर ही छोटे गड्ढे या कंकड़ों के बीच अपने अंडे देता है।
जानकारों के अनुसार टिटहरी अत्यंत सतर्क और सजग पक्षी है। जैसे ही कोई व्यक्ति या जानवर इसके घोंसले के निकट पहुंचता है, यह जोर-जोर से “टिटि-टू-टिट” जैसी आवाज निकालकर चेतावनी देने लगती है। कई बार यह अपने घोंसले से दूर जाकर घायल होने का नाटक भी करती है, ताकि शिकारी या घुसपैठिया उसके अंडों और बच्चों से दूर चला जाए। पक्षी विशेषज्ञ इसे प्रकृति की अद्भुत रक्षा-रणनीतियों में से एक मानते हैं।
टिटहरी के बच्चे रुई के फाहों जैसे मुलायम और आकर्षक दिखाई देते हैं। जन्म के कुछ समय बाद ही वे अपने माता-पिता के साथ चलने लगते हैं और खतरे की स्थिति में झाड़ियों या पत्थरों के बीच छिप जाते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि टिटहरी अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए हर समय चौकन्नी रहती है।
लोकमान्यताओं के अनुसार टिटहरी के अंडे देने की जगह से वर्षा का अनुमान भी लगाया जाता है। किसानों का विश्वास है कि यदि टिटहरी अपेक्षाकृत ऊंचे स्थान पर अंडे देती है तो अच्छी एवं अधिक वर्षा होने की संभावना रहती है, जबकि समतल या निचले स्थान पर अंडे देना कम वर्षा का संकेत माना जाता है। हालांकि वैज्ञानिक रूप से इस मान्यता की पुष्टि नहीं हुई है, फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा आज भी प्रचलित है।
टिटहरी से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा भी लोगों के बीच लोकप्रिय है, जिसमें कहा जाता है कि यह पक्षी अपने पैरों को आकाश की ओर उठाकर सोती है और मानती है कि यदि आकाश गिरेगा तो वह उसे संभाल लेगी। इसी कारण इसे आत्मविश्वास और सजगता का प्रतीक भी माना जाता है।
प्रकृति प्रेमियों का कहना है कि कृषि क्षेत्रों में कीट-पतंगों को खाकर टिटहरी पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके संरक्षण से जैव विविधता को भी बढ़ावा मिलता है। इन दिनों क्षेत्र के ग्रामीण और पक्षी प्रेमी टिटहरी के घोंसले बनाने की गतिविधियों तथा मौसम से जुड़े पारंपरिक संकेतों को उत्सुकता से देख रहे हैं।




