बीकानेर नगर निगम चुनाव में कांग्रेस ने 80 में से 42 वार्डों में जीत दर्ज कर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है। इसके साथ ही निगम में कांग्रेस का बोर्ड बनना तय हो गया है, लेकिन अब पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती मेयर पद को लेकर है। कांग्रेस के भीतर मेयर पद के लिए कई नाम चर्चा में हैं और इनमें से अधिकांश अलग-अलग राजनीतिक गुटों से जुड़े हुए हैं। ऐसे में मेयर का चयन केवल पार्षदों की संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर के राजनीतिक समीकरणों और सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए होने की संभावना है।
मेयर पद के दावेदारों में पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. बी.डी. कल्ला के भतीजे और जनार्दन कल्ला के बेटे अनिल कल्ला का नाम सबसे प्रमुख माना जा रहा है। जनार्दन कल्ला लंबे समय तक डॉ. बी.डी. कल्ला की स्थानीय राजनीति को संभालते रहे हैं। ऐसे में अनिल कल्ला को राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाले चेहरे के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि उनके नाम के साथ राजनीतिक पेच भी जुड़ा है। यदि अनिल कल्ला मेयर बनते हैं तो भविष्य में डॉ. बी.डी. कल्ला के विधानसभा टिकट को लेकर पार्टी के भीतर समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में कल्ला गुट किसी अन्य चेहरे को आगे कर अपने विधानसभा क्षेत्र के राजनीतिक समीकरणों को मजबूत रखने की रणनीति भी अपना सकता है।
दूसरी ओर, मकसूद अहमद भी मेयर पद के मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। बीकानेर में कांग्रेस को स्थानीय निकाय में मौका मिलने पर अल्पसंख्यक समाज को प्रतिनिधित्व देने की परंपरा रही है। मकसूद अहमद पहले नगर परिषद सभापति और बाद में नगर विकास न्यास के चेयरमैन रह चुके हैं। इस बार अल्पसंख्यक समाज के 12 पार्षदों का जीतकर आना भी उनकी दावेदारी को मजबूत करता है। हालांकि उनके सामने चुनौती यह है कि वे पहले ही दो महत्वपूर्ण स्थानीय निकाय पदों पर रह चुके हैं। ऐसे में पार्टी किसी नए चेहरे पर भी दांव खेल सकती है।
वैश्य समाज से आने वाले दिलीप बांठिया का नाम भी मेयर पद की दौड़ में चर्चा में है। वे लंबे समय से कांग्रेस से जुड़े हुए हैं और गंगाशहर-भीनासर क्षेत्र में उनकी राजनीतिक भूमिका मानी जाती है। भाजपा लंबे समय से मेयर पद पर वैश्य समाज को प्रतिनिधित्व देती रही है। ऐसे में कांग्रेस इस बार वैश्य समाज को अपने साथ जोड़ने के लिए बांठिया के नाम पर विचार कर सकती है। हालांकि अन्य दावेदारों की तुलना में पूरे शहर में उनका राजनीतिक प्रभाव सीमित माना जाता है। इसके अलावा वैश्य समाज से धर्मवीर नाहटा का नाम भी महत्वपूर्ण है। नाहटा लंबे समय से बी.डी. कल्ला गुट से जुड़े हुए हैं। यदि कल्ला गुट परिवार के बजाय किसी दूसरे चेहरे को आगे करता है तो नाहटा एक विकल्प हो सकते हैं, हालांकि उनका राजनीतिक अनुभव अपेक्षाकृत कम है।
जाट समाज के समीकरण साधने की स्थिति में चेतना डोटासरा का नाम भी आगे आ सकता है। वे पूर्व नेता प्रतिपक्ष रह चुकी हैं और बीकानेर शहर की राजनीति में जाट समाज को अब तक मेयर पद पर प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। ऐसे में कांग्रेस यदि सामाजिक समीकरणों को प्राथमिकता देती है तो चेतना डोटासरा को मौका मिल सकता है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का राजनीतिक प्रभाव भी इस समीकरण में अहम ह




