राव जैतसी का राज्यारोहण:मरूधरा का स्वर्ण प्रभात
भारत का इतिहास अप्रतिम योद्धाओं,अविश्वसनीय घटनाओं एवं लोमहर्षक बलिदानों की गाथाओं से भरा पड़ा है ।विशेष रूप से राजस्थान तो ऐसे दृष्टांतों की दृष्टि से सिरमौर है । इतिहास में रुचि रखने वालों और सामान्य मानव के मन में वीरों के लिए अगाध श्रद्धा है ,परंतु रणनीतिक कौशल के अभाव में अपने महान वीरों की पराजय की प्रचलित कहानियाँ उन्हें भीतर तक कचोटती हैं , मन में प्रश्न कौंधते हैं की हम हारे क्यों ?समयानुकूल चतुराई क्यों नहीं दिखाई गई ?
वचनेश त्रिपाठी जी ने कहा था
“सब लोग जब वक़्त के साँचे में ढल गए,
कुछ लोग थे जो वक़्त के साँचे बदल गए।”
महान दूरदर्शी,प्रजावत्सल,अद्भुत रणधीर,ग़ज़ब के रणनीतिकार,कूटनीति के गहन ज्ञाता और अद्वितीय रण कौशल के स्वामी राव जैतसी एक ऐसे ही विराट व्यक्तित्व थे । जिन्होंने अपनी दूरदर्शिता,समझ और रणनीतिक चातुर्य से भारत के इतिहास में रक्त और लौह की एक ऐसी लकीर खींच दी जिसे ढकने और छिपाने के अगणित प्रयासों के बावजूद वह दैदीप्यमान नक्षत्र की भांति भारतीय रण इतिहास की सब से उजली रेखा है।
राव जैतसी ने जिस तरह के रणनीतिक कौशल का प्रदर्शन किया एवं भविष्य में होने वाली घटनाओं का सटीक अनुमान लगाया वह देवदुर्लभ गुण है । मुगलों की मंशा को भाँपकर उनकी ताक़त एवं कमजोरियों का जैसा सम्यक् आंकलन किया और उन्होंने नवीन अप्रत्याशित छापामार पद्धति से बाबर के बेटे कामरान को धूल चटाई वह मध्यकालीन भारत के इतिहास का एक अप्रतिम उदाहरण है ।
राती घाटी न सिर्फ़ बीकानेर अपितु पूरे भारत का मान बिंदु है,जिसने ना सिर्फ़ धर्म ध्वजा को अक्षुण्ण रखा और मुग़लों के बेलगाम लश्कर को ऐसा पाठ पढ़ाया की वह इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया।
राव जैतसी का सम्पूर्ण जीवन कण्टकाकीर्ण रहा,परन्तु उनका व्यक्तित्व इन कठिनाइयों से और उन्नत हुआ,नई ऊँचाइयाँ छूने लगा।राव बीकाजी के पौत्र एवं राव लूणकरण के पुत्र राव जैतसी बीकानेर के चौथे शासक बने दिनांक 28 जून 1526 को अति विकट परिस्थितियों में वे सिंहासन पर बैठे ।
शांत योद्धा-सौभाग दीप दुर्ग मैं सिर्फ चौंतीस योद्धा थे और नवाब अलीमोरा ने बीदासर के शासक संसारचंद्र के साथ आक्रमण कर दिया,वे गाढ़वाला तक आ गए,राव जैतसी ने इतने आत्मविश्वास के साथ उनसे बात की कि वो घबराकर वापस लौट गए,प्रथम परीक्षा मैं ही वे खरे उतरे।
भातृ भाव-ढोसी युद्ध मैं गंभीर घायल कुंवर रतनसी स्वस्थ होकर बीकानेर पहुँचे तो राव जैतसी ने तत्काल बड़े भाई को राज्य सौंप दिया,किंतु बड़े भाई ने भीष्म और चूँड़ा की भाँति राज्य का त्याग किया,राज्य के लिए भाई का गला काट देने वाला समय मैं ऐसा अद्भुत प्रेम !
विश्वासघातियों का दमन- राव जैतसी ने शीघ्र सैन्य संगठन कर बीदासर पर आक्रमण किया,संसारचन्द्र भाग गया,इसी तरह से जिसने भी धोखा दिया उन्हें दंड दिया और अपने साथ के लोगों को नए राज्य सौंपे ।
जन सेवा-जन संगठन- बीकानेर राज्य स्थापना कि बाद से ही लगातार विपदाओं से झूझता रहा,किसी भी शासक को प्रजा को सम्भालने का समय ही नहीं मिला,परंतु राव जी ने समझ लिया था कि यह जन शक्ति को एक साथ लेकर चलने का समय है क्योंकि आने वाले समय मैं ऐसी स्थितियाँ आयेंगी जहाँ जनता का भरोसा और साथ अत्यधिक महत्वपूर्ण और निर्णायक होगा।
निर्णायक मोड़-खानवा युद्ध ना सिर्फ़ राणा साँगा के लिए बल्कि पूरे भारत के भविष्य का एक निर्णायक क्षण था,बीकानेर से राव जैतसी ने राव कल्याणमल को इस युद्ध मैं सांगा की तरफ़ से लड़ने के लिए भेजा,बीकानेर के योद्धाओं ने अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया और बाबर के तोपखाने और कब्ज़ा जमा कर युद्ध की धारा मोड़ ही दी थी कि दुर्योग से युद्ध का पासा पलट गया और बाबर ने युद्ध जीत लिया,परंतु यही से बाबर की नजर मैं बीकानेर खटक गया और उसने निश्चय कर लिया कि बीकानेर को दण्ड जरूर दूँगा,बाबर सेना लेकर एक बार बीकानेर की और आया भी परंतु तेज गर्मी और भयंकर लू के थपेड़ों ने उसे वापस लौटने पर मजबूर कर दिया।राव जैतसी समझ गए की बीकानेर पर आक्रमण जरूर होगा।
खानवा युद्ध के सबक- राव जैतसी गहन विश्लेषण करने वाले शासक थे । वे समझ गए की मुगल धोखे से और प्रथम आक्रमण करते हैं,वे युद्ध के किसी नीति-नियम को नहीं मानते,राजधानी से पहले मनोबल तोड़ने के लिए जनता पर भीषण अत्याचार,मनोवैज्ञानिक भय पैदा करना,लालच और भय से विश्वासघातियों को तैयार करना ।
राव जैतसी की तैयारी-राव जी ने सैन्य संगठन,जानता को विश्वास मैं लेने और समस्त भारत के शासकों को संदेश भेजने शुरू कर दिए,उन्होंने अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को भी मजबूत करना शुरू कर दिया ।खानवा के बाद यह पहला युद्ध था जहाँ खानवा युद्ध मैं लड़े सारे शासक एक बार फिर साथ आने को तैयार थे।
कामरान का आक्रमण-बाबर ने अपने पुत्रों से कहा था की बीकानेर को जरूर दण्ड देना,अपने पिता की इच्छानुरूप गजनी और लाहौर का शासक कामरान भटनेर के रास्ते से होते हुए बीकानेर की और आ बढ़ा ।राव जी ने उसके रंगमहल पहुँचने पर जैतसी ने वहाँ से बीकानेर तक के मार्ग को जनशून्य करवा दिया,महाजन जैसा गढ़ भी जनशून्य मिला ।बीकानेर गढ़ भी ख़ाली कर दिया,ऐसी चतुराई से मुग़लों की एक बड़ी रणनीति को विफल कर दिया।
पहले मारे सो मीर- राव जैतसी ने कामरान को बीकानेर नगर के युद्ध मैं उलझाकर रख दिया और उसे यह विश्वास दिला दिया कि उसने बीकानेर जीत लिया है जैसे ही वह जीत के जश्न मैं डूबा,राव जैत्सी ने अर्धरात्रि को छापामार युद्ध प्रणाली का प्रयोग करते हुए चारों दिशाओं से आक्रमण कर दिया साथ ही हजारों बैलों और ऊंटो पर मशालें बाँध कर नगाड़ो के शोर से कामरान की सेना को भ्रमित कर दिया और फिर अद्भुत वीरता का परिचय देते हुए आमने-सामने के युद्ध मैं कामरान को पराजित कर दिया,वह इतनी तेजी से भागा कि उसका मुकुट भी यहीं गिर गया।
भारतीय शौर्य की गौरवमय गाथा- राती घाटी युद्ध मैं पराजय से मुगलों के अपराजेय होने का भ्रम टूट गया,मुग़लों की पराजय का श्रीगणेश हुआ।सदेह विराजमान माँ करणी के आशीर्वाद से राव जैतसी ने इस युद्ध मैं विजय से राष्ट्रीय परिदृश्य पर एक नई लकीर खींच दी,वे राष्ट्र नायक बन गए ।राम-राम इस युद्ध का प्रमुख जयघोष था,मुगलों को पराजित कर राव जैतसी ने बाबर द्वारा प्रभु श्री राम जन्मभूमि के विध्वंस का भी प्रतिशोध ले लिया। महान इतिहासकार डॉ.राजेंद्र सिंह कुशवाहा ने अपने ग्रंथ – ग्लैम्पसेज ऑफ़ भारतीय हिस्ट्री राम टू अटलबिहारी वाजपेयी मैं लिखा की “राती घाटी युद्ध भारतीय शौर्य की गौरव गाथा है ।”
राव जैतसी भारतीय इतिहास के ऐसे नायक हैं जिन्होंने हमारे अन्य महान नायकों जैसे महाराणा प्रताप,छत्रपति शिवाजी महाराज आदि के सामने छापामार युद्ध प्रणाली जैसी प्रभावी युद्ध नीति का उदाहरण रखा ।
आज अपने इस महान नायक के राज्यारोहण दिवस के अवसर पर कृतज्ञ राष्ट्र उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजली अर्पित करता है।
डॉ.चक्रवर्ती जानकी नारायण श्रीमाली,
ब्रह्मपुरी चौक बीकानेर ।
9829297392





